जिन्दगी की कुछ अनकही बाँतें, अनकही मुलाकातें... (Part - 7)

 दोस्ती

हर एक की जि‍न्दगी में एक सच्चा दोस्त या बहुत सारे दोस्त तो होते ही हैं। जिन्‍दगी में हर किसी की दोस्ती को “श्री कृष्ण और सुदामाजी” की मिसाल दी जाती हैं। दोस्ती ऐसे रिश्ते के नाम हैं जिसमें कोई वक्त या दौर नहीं देखा जाता, ना ही कोई उम्र देखी जाती हैं। ये रिश्ता ऐसा हैं मानो किसी की जिन्‍दगी उजाड़ भी सकती और किसी की जिन्‍दगी बना भी सकती हैं।

स्कूल के दोस्तों की कुछ बात ही ओर हैं। कितने भी बड़े हो जाए। बचपन की साथ में की हुई शरारतें हो या मेडम के हाथ से पिटाई अच्छी ही लगती थी। क्योंकि तब ऐसा लगता था मानो मिल बाँटकर खा रहे हैं। दोस्तों का घर आना साथ में पढाई करना, पढ़ाई के बहाने गप्पे मारना, वो सब आज भी याद करके अकेले हँस लिया करते हैं। वो स्कूल का समय कैसे आगे बढ़ता चला गया पता ही नहीं चला। लेकिन इसमे कोई दोराहा नहीं हैं की इस रिश्ते के वजह से कौन क्या हैं ये पता चल जाता हैं। दुनिया में किस तरह के लोग हैं, अपने आसपास हो या अपने साथ पता चलता हैं की कौन क्या सोचता हैं? क्या सपने हैं दोस्तों के? दोस्ती एक ऐसा रिश्ता हैं जो शायद जिन्‍दगी के काफ़ी सारे पहेलू से मुलाकात करवाता हैं। ये रिश्ते में कोई बँध कर रह नही सकता। ये रिश्ता तो आजाद पक्षीयों की तरह हैं, जिन्हें आसमान में बहुत ऊपर उड़ना हैं और अपने साथ अपने दोस्त को भी लेकर चलना हैं।

दोस्ती ऐसे रिश्ते का नाम हैं जहाँ विश्वास बनता भी हैं और टूटता भी हैं। पर इसका मतलब ये नही हैं की सारे रिश्ते एक समान होते हैं। कभी कुछ हालात एस रिश्ते को बिगाड़ भी सकते हैं तो कभी उनके बीच की समझदारी रिश्तों को वापिस जोड़ देती हैं। स्कूल खतम होते ही कॉलेज की ओर बढ़ते हैं। पूरी अलग दुनिया सी लगती हैं जहाँ स्कूल जैसा माहोल न के बराबर होता हैं। लेकिन फिर भी ये अनकहे लोग जब दोस्त बन जाते हैं तो एक अलग सा फितूर होता हैं। कॉलेज के कॅन्‍टिन से लेकर क्लास तक। यूथ फेस्ट से लेकर कॉलेज डेज तक सब बदला सा लगता हैं।

स्कूल और कॉलेज के दिनों में दोस्ती के बहुत सारे वादे तो करते हैं पर जब करियर को लेकर सिरियस होना पड़ता हैं तब शायद हम किसी के लिए वक्त नही निकाल पाते। सभी अपने जॉब – पढाई में व्यस्त हो जाते हैं। लेकिन फिर भी कोशिश करते हैं कि जैसे भी हो अपने उन्हीं दोस्तों से मिलकर वही पुरानी यादों को दोहराए। अपने उन्ही स्कूल – कॉलेजो की बाँतो याद करके खूब हँसे और एक दूसरे को अपनी जिन्‍दगी की आज की कहानियाँ बताए। अपना वक्त और खुशियाँ दोनों बाँटे।

दोस्ती में जरूरी नहीं हैं हर रोज बात हो, लेकिन जब भी बात हो तो दिल खोलकर हो। उसमें शिकायतें कम और एक – दूसरे का सहारा ज्यादा हो। मैंने अपनी जिन्‍दगी में जिन दोस्तों को बहुत करीब से जाना हैं उनसे रोज तो बात अब नहीं हो पाती हैं। लेकिन कोशिश रहती हूँ की जब भी वक्त मिले तो बात करे और मिला करे। दोस्तो के किस्सो से आज भी जेब भरी हुई सी लगती हैं। जिसमें हँसी, खुशी, रोने से लेकर हर भावनाएं कुद – कुदकर बहार निकलती हैं और कहती हैं मुझे कि, “हमें याद करना भूल गए क्या!”

"जिन्‍दगी के उतार चढ़ाव बहुत से देखे,

पर तुमसा ना दोस्त देखा,

आज हम व्यस्त हैं मगर,

पर यारो की यादों से मिलने का मौका न छोड़ा,

जल्द मिलेंगे दोस्त सभी,

पुरानी यादों और बातों के साथ,

उसी गली, उसी महोल्ले,

जहाँ से की थी इस दोस्ती की शुरुआत।"

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